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दरकती सांसों से पूछो, रैगिंग क्या होता है ?….

Posted On 12 May, 2016 में

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“ राज बचपन से पढाई में कुशाग्र व मेहनती किस्म का छात्र था, उसे किस्मत को चुनौती देना, व सपनों को हकीकत में बदलने का जूनून था. उसने अपने परिवार व समाज के लिए कई सपने संजो रखे थे. १२ वीं कक्षा में अच्छे अंक लाने के कारण उसका नामांकन राज्य के प्रतिष्ठत शिक्षण संसथान में हो गया. अब उसका अवचेतन मन आसमां को मुट्ठी में करने को तमाम तरह के ख्यालात बुनने लगा था. पर उसे यह कहाँ पता था कि जिस संस्थान से वह स्वर्णिम भविष्य की आशा कर रहा है, वहीँ उसके दामन में जीवन भर के लिए गहरा दाग जुड़ जाने वाला है. ऐसा दाग जो रह-रहकर उसके आत्मीय वजूद को झकझोर देता हो व बरबस उसे इस जहां से रुखसत होने को मजबूर करता हो ”. जी हाँ, मैं रैगिंग की बात कर रहा हूँ.
यह कहानी अमूमन अधिकांश भारतीय विद्यार्थियों के जीवन गाथा से मेल खाती है. एक आकलन के मुताबिक भारत के लगभग 80 % छात्र अपने जीवन में रैगिंग के दर्दनाक व अविस्मरनीय अनुभव को झेल चुके हैं. कई तो मन-मस्तिष्क में तूफ़ान की तरह उफान मचा रहे उन कड़वी यादों से मुक्ति पाने के लिए आत्महत्या का मार्ग अख्तियार कर अपने परिवार वालों को नारकीय दुनियां की ओर धकेल देते हैं, वही कुछ शख्स ऐसे भी होते हैं, जो रैगिंग के जघन्य अपराध से पीड़ित होकर चलता-फिरता पुतला मात्र बनकर रह जाते हैं, उनमें न तो दुनिया के प्रति लगाव शेष रहता है और न जीवन के हसीं रंगों के प्रति आकर्षण. मानव रूपी भेड़िये अपनी झूठी शान व अर्थहीन आबरू के लिए अनजाने ही सही पर, विद्यार्थी समेत उसके परिवार व समाज को निराशा के गहरे गर्त में डाल देता है. उनके मनोरंजन मात्र के लिए जूनियर छात्रों को कई दफ़ा खौफनाक सितमों से गुजरना पड़ता है. विश्व की दुरुस्ततम माने जाने वाली भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए यह बेहद चिंताजनक पहलु है. अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटने की कोशिश करते हैं तो तमाम दर्दनाक किस्से हमारे नैनों के सामने आकर ऐसे पसर जाते हैं, मानो वे हमसे रैगिंग को समूल नष्ट करने की मांग लिए कराह रहे हो.
हमारे यहाँ रैगिंग के खिलाफ ठोस कानून के प्रावधान हैं, पर बकायदा हकीकत में इसके प्रभाव की बात करें तो, यह अब भी महज चंद विद्यालयों व कॉलेजों तक सिमित रह गया है. देश के कई सरकारी व गैर सरकारी शिक्षण संस्थानों में छात्र अब भी सीनियर छात्रों द्वारा मानसिक व भौतिक कुठाराघात सहने को मजबूर है. इसके पीछे कई कारण संलिप्त हैं, जिनकी पड़ताल बेहद जरुरी है. सबसे दुखद तो यह है कि रैगिंग से पीड़ित छात्र अपने मन में इंतकाम की भावना बसाये, इस कुकर्म की श्रंखला को बरकारार रखते हैं, और इसी तरह यह परंपरा चलती रहती है. हर बार इंतकाम की आग में नव आगंतुक झुलसते रहते हैं और बार- बार खिलने व महक सकने वाली कलियाँ कुछ अवांछनीय तापिशों के कारण मुरझाकर बेकार हो जाते हैं. समाज व संसार के लोग रैगिंग से पीड़ित छात्रों की भावनाओं को समझ पाने काफी हद तक नाकाम रहते हैं. कई दफ़ा यह देखा भी जाता है कि अपने साथ हुए कडवे अनुभव की याद में मायूस हुए चेहरों को परिजनों व समाज के लोगों द्वारा डांट झपट दी जाती है.
पिछले 7 वर्षों में लगभग तीस विद्यार्थी रैगिंग से तंग आकर मौत से बाहें मिला चुके हैं. इस अति गंभीर मसले के निपटारे के लिए भारत में तमाम एंटी रैगिंग कमिटियों का गठन किया गया है, जो हर वक़्त रैगिंग को खत्म करने की दिशा में कार्यरत है. तमाम सुविधाएं भी मुहैय्या की गयी है, पर वे सब बेअसर धरे के धरे रह जाते हैं, क्योंकि जिस कदर सीनियर्स अपने जूनियर छात्रों के जेहन में भय का डोज डाल देते हैं, उससे कोई भी जूनियर उनके खिलाफ आवाज़ उठाने की जुर्रत नहीं करता. परिणामस्वरुप, उनकें होंसलों में बढ़ोतरी होती है और रैगिंग का यह दर्दनाक सिलसिला चलता रहता है. जब तक हम आप और इस समाज के लोग रैगिंग के खिलाफ मुहीम छेड़ते हुए अपने- अपने परिवेश में जागरूकता नहीं फैलाएँगें, तब तक तय है कि यह सिलसिला यहीं नहीं थमने वाला.

आदित्य शर्मा

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