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जनोंमाद का डर !

Posted On: 22 Mar, 2017 में

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बदलाव हमेशा ही कौतुहल व मिश्रित भावों से परिपूर्ण वातावरण की रचना करता है । कुछ बदलाव ऐसे होते हैं , जो लोगों की ज़िन्दगी में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। वहीं कुछ बदलाव ऐसे भी होते हैं जो भारी रोष व उन्माद का कारण बनते हैं । खैर, बिना बातों को गोल गोल घुमाये , स्पष्टतः अपना बाण सटीक निशाने पर साधने की कोशिश करता हूँ ।

सन् 1975 , आजादी को अख्तियार किये महज 27 वर्ष और वो भयानक त्रासदी जिसने हर भारतीय को झकझोर कर लोकतंत्र के मुखड़े पर काली स्याही पोत दी । जी हां, मैं आपातकाल की बात कर रहा हूँ । कौन भूल सकता है उस समयावधि को , उन जुल्मों को, उस इहलीला को ! इंदिरा गांधी के शासनकाल का सबसे बदनुमा दौर जिसने उनके राजनीतिक व सामाजिक छवि को बुरी तरह प्रभावित किया । इस संक्षिप्त चर्चा का गूढ़ उद्देश्य वर्तमान हुक्मरानों को सचेत करना है, जो सत्ता पाते ही , उल -जुलूल हरकतें करने से उचकते नहीं हैं ।

दो उदाहरणों से स्पष्ट करता हूँ , पहला हमारे मुल्क के आलाकमान व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लिए गए नोटबन्दी के फैसले के नफा- नुकसान का और दूसरा यूपी के नवचयनित मुख्यमंत्री योगी आदित्यराज द्वारा उठाये गए कदमों के भावी प्रभावों का । साफ है, जनता की भलाई को मद्देनज़र रखकर ये कदम उठाये गए । पर कहीं न कहीं भारी चूक रही और रहने का अंदेशा भी है । एक तरफ नोटबन्दी अपने उद्देश्ययों को पूर्ण तरीके से हासिल करने में नाकाम रही तो दूजी तरफ यूपी में योगी सरकार के आदेश के पश्चात आई कुछ तस्वीरें विचलित करती हैं । मनचले युवकों के कुकृत्यों को संयमित करने हेतु यूपी पुलिस जिस कदर अपना काम कर रही है, वो चैन की सांसे प्रदान करती हैं , साथ में गलत तरीके से अमल में आने के डर से चिंता की लकीरें भी उकेरती हैं ।

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